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मंत्रालय के बारे में

मंत्रालय के बारे में

संगठन

ग्रामीण विकास मंत्रालय के दो विभाग है
ग्रामीण विकास विभाग तथा भूमि संसाधन विभाग

भारत अपनी आजादी के समय से ही एक कल्याणकारी देश रहा है और सभी सरकारी प्रयासों का बुनियादी उद्देश्य भारत के लोगों का हित-कल्याण करना रहा है। योजना स्वतंत्रता प्राप्ति के समय से ही भारतीय नीति-निर्माण का एक मुख्य स्तंभ रही है और योजना की उपलब्धि ही देश की शक्ति है। ग्रामीण गरीबी के उन्मूलन के उद्देश्य को लेकर ही नीतियां और कार्यक्रम बनाए जाते रहे हैं और भारत में योजनाबद्ध विकास का यह मुख्य उद्देश्य रहा है। यह महसूस किया गया कि गरीबी उन्मू‍लन की चिरस्थायी कार्यनीति, प्रगति की प्रक्रिया में रोजगार के सार्थक अवसर बढ़ाने के सिद्धांत पर होनी चाहिए। गरीबी, अज्ञानता, रोगों तथा अवसरों की असमानता को दूर करना और देशवासियों को बेहतर तथा उच्च जीवन स्तर प्रदान करना ऐसी बुनियादी कार्यनीतियां हैं जिन पर विकास की सभी योजनाओं का ताना-बाना बुना गया है।

ग्रामीण विकास का अभिप्राय एक ओर जहां लोगों का बेहतर आर्थिक विकास करना है वहीं दूसरी ओर वृह्त सामाजिक कायाकल्प भी करना है। ग्रामीण लोगों को आर्थिक विकास की बेहतर संभावनाएं मुहैया कराने के उद्देश्य से ग्रामीण विकास कार्यक्रमों में लोगों की उत्तोत्तर भागीदारी सुनिश्चित करने, योजना का विकेन्द्रीकरण करने, भूमि सुधार को बेहतर ढ़ंग से लागू करने और ऋण प्राप्ति का दायरा बढ़ाने का प्रावधान किया गया है। .

अक्तूबर, 1974 के दौरान ग्रामीण विकास विभाग खाद्य और कृषि मंत्रालय के अंग के रूप में अस्तित्व में आया। 18 अगस्त, 1979 को ग्रामीण विकास विभाग का दर्जा बढ़ा कर उसे ग्रामीण पुनर्गठन मंत्रालय का नाम दिया गया। 23 जनवरी, 1982 को इस मंत्रालय का नामकरण ग्रामीण विकास मंत्रालय किया गया। जनवरी, 1985 के दौरान ग्रामीण विकास मंत्रालय को फिर से कृषि तथा ग्रामीण विकास मंत्रालय के अधीन एक विभाग के रूप में बदल दिया गया जिसे बाद में, सितम्बर, 1985 के दौरान कृषि मंत्रालय का नाम दिया गया। 5 जुलाई, 1991 को इस विभाग को पुन: ग्रामीण विकास मंत्रालय का दर्जा दिया गया। 2 जुलाई, 1992 को इस मंत्रालय के अधीन बंजर भूमि विकास विभाग के नाम से एक और विभाग का गठन किया गया। मार्च, 1995 के दौरान इस मंत्रालय का पुन: नाम बदलकर ग्रामीण क्षेत्र तथा रोजगार मंत्रालय रखा गया और इसमें तीन विभाग शामिल किये गये यथा - ग्रामीण रोजगार तथा गरीबी उन्मूलन विभाग, ग्रामीण विकास विभाग तथा बंजर भूमि विकास विभाग।

वर्ष 1999 में ग्रामीण क्षेत्र तथा रोजगार मंत्रालय का एकबार फिर नाम बदलकर ग्रामीण विकास मंत्रालय रखा गया। यह मंत्रालय व्यायपक कार्यक्रमों का कार्यान्वमयन करके ग्रामीण क्षेत्रों में बदलाव लाने के उद्देशय से एक उत्प्रेरक मंत्रालय का कार्य करता आ रहा है। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य गरीबी उन्मू्लन, रोजगार सृजन, अवसंरचना विकास तथा सामाजिक सुरक्षा है। समय के साथ-साथ कार्यक्रमों के कार्यान्वअयन में प्राप्त अनुभव के आधार पर तथा गरीब लोगों की जरूरतों का ध्याोन रखते हुए कई कार्यक्रमों में संशोधन किये गये और नये कार्यक्रम लागू किये गए। इस मंत्रालय का मुख्यं उद्देश्य ग्रामीण गरीबी को दूर करना तथा ग्रामीण आबादी विशेष रूप से गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे लोगों को बेहतर जीवन स्तपर मुहैया करना है। इन उद्देश्यों की पूर्ति ग्रामीण जीवन और कार्यकलापों के विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित कार्यक्रमों को तैयार करके, उनका विकास करके तथा उनका कार्यान्वयन करके की जाती है।

इस बात का सुनिश्चित करने के उद्देश्य से कि आर्थिक सुधारों का लाभ समाज के सभी वर्गों को मिले ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन स्तिर के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक तथा आर्थिक अवसंरचना के पांच कारकों की पहचान की गई। ये कारक इस प्रकार हैं- स्वास्थ्य , शिक्षा, पेयजल, आवास तथा सड़कें। इन क्षेत्रों में किये जा रहे प्रयासों को और बढ़ाने के लिए सरकार ने प्रधान मंत्री ग्रामीण योजना (पीएमजीवाई) शुरू की और ग्रामीण विकास मंत्रालय को प्रधान मंत्री योजना (पीएमजीवाई) के निम्नऔलिखित भागों को कार्यान्वित करने का दायित्व सौंपा गया, यथा - पेयजल आपूर्ति, आवास निर्माण तथा ग्रामीण सड़कों का निर्माण करना।

नौवीं योजना अवधि के दौरान कई गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों का पुनर्गठन किया गया ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में रह रहे गरीब लोगों को उत्त्रोत्ततर लाभ देने के लिए कार्यक्रमों की दक्षता बढ़ाई जा सके। एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम (आईआरडीपी), ग्रामीण क्षेत्रों में महिला और बाल विकास कार्यक्रम (डीडब्यूद सीआरए), ग्रामीण दस्तऔकारों को बेहतर औजारों की आपूर्ति से संबंधित कार्यक्रम (एसआईटीआरए), स्वे-रोजगार के लिए ग्रामीण युवाओं के प्रशिक्षण से संबद्ध कार्यक्रम (टीआरवाईएसईएम), गंगा कल्याीण योजना (जीकेवाई) तथा मिलियन कूप स्कीाम (एमडब्यूक एस) का विलय समग्र स्व-रोजगार योजना में किया गया जिसे स्वर्णजयंती ग्राम स्वय-रोजगार योजना (एसजीएसवाई) का नाम दिया गया।

स्थानीय लोगों की जरूरतों और उनकी आकांक्षाओं को ध्या्न में रखते हुए पंचायती राज संस्थालओं का सहयोग इस कार्यक्रम के कार्यान्वकयन में लिया गया। ये संस्‍थाएं योजना तथा उसके कार्यान्वयन के विकेन्द्री कृत विकास का रूप हैं। मंत्रालय राज्यो सरकारों से जोर देकर यह कह रहा है कि वे पंचायती राज संस्थालओं को अपेक्षित प्रशासनिक तथा वित्तीहय शक्तियां शीघ्रतिशीघ्र दें जैसाकि भारत के 73वें संविधान संशोधन में कहा गया है। 25 दिसम्बैर, 2002 को पेयजल क्षेत्र के अधीन 'स्वा-जलधारा' नामक नया कार्यक्रम शुरू किया गया जिसके अधीन पेयजल परियोजनाएं तैयार करने, उन्हें् कार्यान्वित करने, उनका संचालन करने तथा उनका रखरखाव करने की शक्तियां पंचायतों को देने का प्रावधान है। पंचायती राज संस्थाओं का विकास प्रक्रिया में और सहयोग लेने के उद्देश्यन से माननीय प्रधान मंत्री द्वारा 27 जनवरी, 2003 को 'हरियाली' नामक एक नया कार्यक्रम शुरू किया गया। हरियाली नामक कार्यक्रम शुरू करने का उद्देश्य बंजर भूमि विकास कार्यक्रमों अर्थात् आईडब्यूडीपी, डीपीएपी और डीडीपी के कार्यान्व्यन में पंचायती राज संस्थाओं का सहयोग लेना है।

ग्रामीण महिलाओं का सशेक्तिकरण ग्रामीण भारत के विकास के लिए महत्वापूर्ण है। महिलाओं को विकास की मुख्येधारा में लाना भारत सरकार का मुख्य दायित्व रहा है। इसलिए गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों में महिलाओं के योगदान का भी प्रावधान किया गया है ताकि इस समाज के इस वर्ग के लिए पर्याप्त निधियों की व्यवस्था की जा सके। संविधान (73वां) संशोधन अधिनियम, 1992 में महिलाओं के लिए चुनिन्दा पदों के आरक्षण की व्यावस्था है। भारत के संविधान में आर्थिक विकास तथा सामाजिक न्याय से संबंधित विभिन्न कार्यक्रमों को तैयार करके निष्पादित करने का दायित्वा पंचायतों को सौंपा है, और कई केन्द्रि प्रायोजित योजनाएं पंचायतों के जरिये कार्यान्वित की जा रही हैं। इस प्रकार, पंचायतों की महिला सदस्यों और महिला अध्यहक्षों, जो बुनियादी रूप से पंचायतों की नई सदस्या्ं हैं, को अपेक्षित कौशल प्राप्त, करना होगा और उन्हें नेतृत्व का निर्वाह करने तथा निर्णय में सहभागी होने के लिए अपनी उचित भूमिकाओं को निभाने हेतु उचित प्रशिक्षण देना होगा। पंचायती राज संस्थाओ के चुनिंदा प्रतिनिधियों को प्रशिक्षण देने का दायित्वू बुनियादी रूप से राज्य सरकारों/संघ राज्यं क्षेत्र प्रशासनों का है। ग्रामीण विकास मंत्रालय राज्यों /संघ राज्य क्षेत्रों को भी कुछ वित्तीय सहायता मुहैया कराता है ताकि प्रशिक्षण कार्यक्रमों के स्तर को बेहतर बनाया जा सके और पंचायती राज संस्था्ओं के चुने हुए सदस्यों और कार्यकर्ताओं के लिए क्षमता निर्माण पहलें की जा सकें।

मंत्रालय दो अंतर्राष्ट्रीय संगठनों अर्थात् सेंटर ऑन इंटीग्रेटिड रूरल डेवलेपमेंट ऑफ एशिया एंड पेसिफिक (सीआईआरडीएपी) तथा एफ्रो-एशियन रूरल डेवलेपमेंट ऑर्गनाइजेशन (एएआरडीओ) के लिए नोडल विभाग है।

मंत्रालय के निम्नालिखित दो विभाग हैं :-

  1. ग्रामीण विकास विभाग
  2. भूमि संसाधन विभाग

ग्रामीण विकास विभाग द्वारा स्वि-रोजगार सृजन योजना तथा मजदूरी रोजगार योजना, ग्रामीण गरीबों के लिए मकानों के प्रावधान और लघु सिंचाई साधन योजना, बेसहारा लोगों के लिए सामाजिक सहायता योजनाओं और ग्रामीण सड़क निर्माण योजना का क्रियान्वयन किया जाता है। इसके अलावा, इस विभाग द्वारा डीआरडीए प्रशासन, पंचायती राज संस्थाओं, प्रशिक्षण तथा अनुसंधान, मानव संसाधन विकास, स्वैच्छिक कार्य विकास आदि के लिए सहायक सेवाएं एवं अन्य गुणवत्ता संसाधन उपलब्ध कराए जाते हैं ताकि कार्यक्रमों का समुचित कार्यान्वयन हो सके। ग्रामीण विकास विभाग द्वारा संचालित मुख्य कार्यक्रम इस प्रकार हैं - महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (महात्मा गांधी नरेगा), प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई), इंदिरा आवास योजना तथा स्वर्णजयंती ग्राम स्वग-रोजगार योजना (एसजीएसवाई), अब राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के नाम से ज्ञात (एनआरएलएम), राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (एनएसएपी) तथा ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी सुविधाओं का प्रावधान (पीयूआरए)।

भूमि संसाधन विभाग द्वारा देश में बंजर भूमि का विकास करके बायोमास उत्पादन बढ़ाने से संबंधित योजनाओं का कार्यान्वन किया जाता है। इस विभाग द्वारा सहायता सेवाएं तथा अन्य गुणवत्ताई युक्त् कार्य भी किये जाते हैं जैसे भूमि सुधार, राजस्वन पद्धति की बेहतरी तथा भू-अभिलेख। यह विभाग देश में मरू क्षेत्रों और सूखे प्रवण क्षेत्रों का विकास भी करता है। भूमि संसाधन विभाग के मुख्य कार्यक्रम इस प्रकार हैं - राष्ट्रीय भू-अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (एनएलआरएमपी) तथा एकीकृत वाटर शेड प्रबंधन कार्यक्रम (आईडब्यू्एमपी)। इनका उद्देश्य अवक्रमित भूमि की बंजर भूमि में मिट्टी तथा नमी संरक्षण और उत्पादकता को बढ़ाना है ताकि लोगों की आय को बढ़ाया जा सके।

पेयजल तथा सफाई व्यवस्था का प्रावधान और ग्रामीण गरीबों को सफाई सुविधाएं देने का प्रावधान पेयजल आपूर्ति विभाग के मुख्य कार्यकलाप हैं। पेयजल आपूर्ति विभाग के मुख्य कार्यक्रम इस प्रकार हैं - सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान (टीएससी) तथा राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम (एनआरडीडब्यूभपी)।

योजनाएं

ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा निम्नलिखित प्रमुख कार्यक्रमों को ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित किया जा रहा है ,

  1. महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) रोजगार देने के लिए,
  2. राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) स्वरोजगार और कौशल विकास के लिए,
  3. प्रधान मंत्री आवास योजना ग्रामीण (पीएमएवाईजी) बीपीएल परिवारों को आवास उपलब्ध कराने के लिए,
  4. प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) गुणवत्तापूर्ण सड़कों के निर्माण के लिए,
  5. राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (एनएसएपी) सामाजिक पेंशन के लिए,
  6. एकीकृत जलग्रहण प्रबंधन कार्यक्रम (आईडब्ल्यूएमपी) भूमि की उत्पादकता में सुधार लाने के लिए।

इसके अलावा, मंत्रालय के पास ग्रामीण पदाधिकारियों, सूचना, शिक्षा और संचार, निगरानी और मूल्यांकन, क्षमता के विकास के लिए योजनाएं हैं।

बजट

वित्तीय वर्ष 2016-17 के लिए ग्रामीण विकास विभाग के योजना प्रमुख के तहत 86000 करोड़ रुपये का बजट परिव्यय प्रदान किया गया है। विभाग को आरई चरण में 9000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि आवंटित की गई है, जिससे 95000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

वित्तीय वर्ष 2017-18 के लिए ग्रामीण विकास विभाग को 105447.88 करोड़ रुपये का बजट परिव्यय आवंटित किया गया है।

वित्तीय वर्ष 2018-19 के लिए ग्रामीण विकास विभाग को 112403.92 करोड़ रुपये का बजट परिव्यय आवंटित किया गया है।

वित्तीय वर्ष 2017-18 के लिए ग्रामीण विकास विभाग को 117647.19 करोड़ रुपये का बजट परिव्यय आवंटित किया गया है।

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